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Tuesday, October 17, 2017

मोटापा कम करने का ये तरीका हो सकता है ख़तरनाक

मोटापा कम करने का ये तरीका हो सकता है ख़तरनाक


मोटापा कम करने या दूसरे शब्दों में कहें तो शरीर से चर्बी घटाने के लिए की जाने वाली सर्जरी को लिपोसक्शन कहा जाता है.
डॉक्टरों ने लिपोसक्शन को लेकर कुछ गंभीर चिंताएं ज़ाहिर की हैं.
डॉक्टरों का कहना है कि लिपोसक्शन की वजह से मोटापे वाले ग्लोब्यूल्स फेफड़ों में दाखिल हो सकते हैं.
डॉक्टरों ने ये दावा 45 साल की एक महिला के केस के हवाले से किया है. घुटने और टांगों से मोटापा कम करने के बाद इस महिला को सांस लेने में दिक्कत होने लगी थी.
ब्रितानी शहर बर्मिंघम के डॉक्टरों ने बताया कि महिला की हालत इतनी नाज़ुक थी कि वो मौत के मुंह से लौटी हैं.

जानलेवा भी हो सकता है लिपोसक्शन

बीएमजे की रिपोर्ट के मुताबिक, लिपोसेक्शन ब्रिटेन में तेजी से फैल रही बीमारी है जो मरीज़ों की ज़िंदगी के लिए काफ़ी ख़तरनाक है.
सैंडवेल और वेस्ट बर्मिंघम अस्पताल की आईसीयू यूनिट के डॉक्टर अदम अली ने कहा, "इससे पहले ब्रिटेन में फ़ैट इंबोलिज़्म सिंड्रोम (एफ़ईएस) का कोई मामला देखने को नहीं मिला था, लेकिन इसके होने की संभावनाओं पर ध्यान देने की ज़रूरत है."
जिस मरीज़ के हवाले से ये बात हो रही है, वो बेहद मोटी थीं और लिपोसक्शन से पहले ग्रैस्ट्रिक ऑपरेशन से गुज़री थीं.
लेकिन ऑपरेशन के 36 घंटे के बाद उनकी हालत बेहद नाज़ुक हो गई और उन्हें सांस लेने में दिक्कत होने लगी, जिसके बाद उन्हें आईसीयू में शिफ्ट कर दिया गया.

लिपोसक्शन है क्या?

डॉक्टरों के तुरंत इलाज के चलते महिला की जान बचा ली गई और तीन हफ्ते के बाद उन्हें अस्पताल से छुट्टी मिल गई.
रिपोर्ट का कहना है कि एफ़ईएस को पहचानना और इलाज करना डॉक्टरों के लिए एक चुनौती की तरह है क्योंकि इसके लक्षण बहुत ही सामान्य और कम हैं.
दरअसल लिपोसक्शन एक ऐसा मेडिकल तरीका है जिसके ज़रिए डॉक्टर शरीर के उन हिस्सों से मोटापा कम कर देते हैं, जहां इन्हें शिफ्ट नहीं किया जा सकता.
जैसे जांघ, हिप्स और पेट. ये तरीका उन लोगों के लिए सबसे बेहतर है जिनकी त्वचा बहुत टाइट और वज़न सामान्य होता है.
इसके नतीजे काफ़ी वक्त तक रहते हैं. लेकिन अब इसके साइड इफ़ेक्ट्स को देखते हुए ये कहा जा रहा है कि लिपोसक्शन के कई बार ग़लत परिणाम भी होते हैं.

ब्लूटूथ ऑन रखा तो हो सकता है अटैक!

ब्लूटूथ ऑन रखा तो हो सकता है अटैक!

मोबाइल फोन का ब्लूटूथ ऑन रखना ख़तरनाक साबित हो सकता है. सिक्योरिटी कंपनी अर्मिस के शोधकर्ताओं के समूह ने बीते मंगलवार को एक ऐसे मैलवेयर का पता लगाया है जो ब्लूटूथ से जुड़े डिवाइस पर हमला कर सकता है.


यह स्मार्टफोन ही नहीं, बल्कि स्मार्ट टीवी, टैबलेट, लैपटॉप, लाउडस्पीकर और कारों पर भी हमला कर सकता है.
दुनिया में कुल मिलाकर 5.3 अरब डिवाइस हैं जो ब्लूटूथ का इस्तेमाल करते हैं.
इस मैलवेयर का नाम ब्लूबॉर्न है. इसके जरिए हैकर उन डिवाइस को अपने नियंत्रण में ले सकता है जिनका ब्लूटूथ ऑन होगा. इसके जरिए आपके मोबाइल का डाटा आसानी से चोरी किया जा सकता है.
अर्मिस का कहना है, "हमलोगों को लगता है कि ब्लूटूथ डिवाइस से जुड़े कई और ऐसे मैलवेयर हो सकते हैं, जिनकी पहचान की जानी बाकी है."

बगिंग

इसके मैलवेयर के हमले काफी गंभीर हो सकते हैं. ये बग ब्लूटूथ का फायदा उठाकर हमला करता है. ब्लूबॉर्न इसी श्रेणी में आता है.
इसके ज़रिए हमलावर आपके डिवाइस में वायरस भेज कर आपका डेटा चुरा सकते है.
ब्लूबॉर्न को यूजर की सहमति की जरूरत नहीं होती है और वो किसी लिंक पर क्लिक करने को भी नहीं कहता. सिर्फ दस सेकंड में वो किसी एक्टिव ब्लूटूथ डिवाइस को नियंत्रित कर सकता है.
आर्मिस ने एक ऐसा एप्लीकेशन बनाया है जो यह पता लगा सकता है कि आपका डिवाइस सुरक्षित है या नहीं. इस एप्लीकेशन का नाम है 'ब्लूबॉर्न वलनरब्लिटी स्कैनर'. ये ऐप गूगल के ऑनलाइन स्टोर पर उपलब्ध है.

ब्लूजैकिंग

दूसरा खतरा है ब्लूजैकिंग. यह ब्लूटूथ से जुड़े कई डिवाइस को एक साथ स्पैम भेज सकता है.
यह वीकार्ड (पर्सनल इलेक्ट्रॉनिक कार्ड) के जरिए मैसेज भेजता है, जो एक नोट या फिर कॉनटैक्ट नंबर के रूप में होता है. आम तौर पर यह ब्लूटूथ डिवाइस के नाम से स्पैम भेजता है.

ब्लूस्नार्फिंग

यह ब्लूजैकिंग से ज्यादा खत़रनाक है. इसके जरिए सूचनाओं की चोरी होती है. इसका इस्तेमाल मुख्य रूप से फोनबुक और डाटा चुराने के लिए किया जाता है.
इसके जरिए निजी मैसेज और तस्वीर भी चुराए जा सकते हैं. लेकिन इसके लिए हैकर को यूजर से 10 मीटर के दायरे में होना ज़रूरी होता है.

कैसे सुरक्षित रहें

  • माइक्रोसॉफ्ट, गूगल और लिनक्स ने ब्लूबॉर्न से यूजर को बचाने के लिए पैच रिलीज की है, जिसे इंस्टॉल कर लें.
  • आधुनिक उपकरणों में ब्लूटूथ कनेक्टिविटी के लिए कंफर्मेशन कोड ज़रूरी होता है, इसका इस्तेमाल करें.
  • मोड 2 ब्लूटूथ का इस्तेमाल करें, यह ज्यादा सुरक्षित होता है.
  • अपने डिवाइस ब्लूटूथ नाम को हिडेन मोड में ही रखें.
  • इस्तेमाल नहीं किए जाने पर ब्लूटूथ को ऑफ रखें.

Tuesday, September 5, 2017

इंसेफ़ेलाइटिस से निपटने के लिए ज़रूरी हैं ये 6 उपाय

इंसेफ़ेलाइटिस से निपटने के लिए ज़रूरी हैं ये 6 उपाय

गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में महज़ दो दिनों में 42 बच्चों की मौत हो चुकी है.
यह वही मेडिकल कॉलेज है जो बीते कई वर्षों से जानलेवा दिमाग़ी बुख़ार यानी इंसेफ़ेलाइटिस के चलते हर साल औसतन 500 मौतों के लिए अख़बारों की सुर्खियों में आता रहा है.
इस साल भी अब तक इस मर्ज़ से यहां बड़ी संख्या में बच्चों की मौत हो चुकी हैं. अभी इसका तांडव ख़त्म होने में कम से कम 5 महीने बाकी हैं. तब तक न जाने यह आंकड़ा कितना ऊपर चला जाएगा.
नवजात शिशुओं की मृत्युदर में अचानक आए इस उछाल की वजहों और इसे रोकने के उपायों पर बीबीसी ने बाबा राघव दास मेडिकल कॉलेज के पूर्व प्राचार्य और बाल रोग विशेषज्ञ प्रोफ़ेसर केपी कुशवाहा से बात की.

1- साफ़-सफ़ाई पर जागरूकता बढ़ानी होगी

चाहे इंसेफ़ेलाइटिस हो या फिर नवजातों की मौत, सफ़ाई का अभाव इनके पीछे बड़ी वजह है.
ग्रामीण इलाकों में अभी भी 'सौर' (घर में नवजात और प्रसूता के लिए बनाया गया कमरा) में पर्याप्त साफ़-सफ़ाई नहीं होती जिससे नवजात को संक्रमण का ख़तरा कई गुना बढ़ जाता है.
2-निचले स्तर पर प्रशिक्षित कार्यकर्ताओं की तैनाती हो
मेडिकल कॉलेज तक पहुंचने वाले 50 फ़ीसदी बच्चों में ब्रेन डैमेज की स्थिति आ चुकी होती है.
दिमाग में ऑक्सीजन की आपूर्ति रुकने लगती है, दिल और गुर्दे काम करना बंद करने लगते हैं.
ऐसा इस वजह से होता है क्योंकि बच्चे को इलाज मिलने में देर हो गई होती है.
ज़रूरत इस बात की है कि प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों से लेकर ऊपरी चिकित्सा केन्द्रों पर ऐसे मामलों की पहचान कर सकने के लिए शिक्षित-प्रशिक्षित चिकित्सा कर्मी नियुक्त हों.
यदि हम पंचायत स्तर पर आशा कर्मियों की तरह ही ऐसे कार्यकर्ता तैनात कर सकें तो इंसेफ़ेलाइटिस से लड़ने में भी बड़ी मदद मिलेगी.
3-ब्रेस्ट फीडिंग काउंसलर लगाए जाएं
नवजात शिशुओं की बहुत सी समस्याएं केवल स्तनपान से भी ठीक हो सकती हैं, इसलिए निचले स्तर पर स्तनपान परामर्शक तैनात किए जाएं.
इससे मृत्युदर में बहुत कमी लाई जा सकती है.

4-भीड़ के अनुरूप संसाधन बढ़ाना ज़रूरी

पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार और नेपाल के गंभीर रोगियों के इलाज का भार वहन करने वाले इस मेडिकल कॉलेज में नियोनेटल आईसीयू में कुल 44 बेड हैं.
जबकि भर्ती बच्चों की संख्या अक्सर 100 के करीब होती है.
संक्रमण रोकने के लिए आदर्श स्थिति यह है कि एक से दूसरे बेड के बीच 3 फ़ीट का फ़ासला रहे मगर यहां एक-एक बेड पर 3-3 बच्चे हैं.
इससे संक्रमण का ख़तरा बढ़ जाता है. ऐसे में क्षमता बढ़ाना ज़रूरी है.

5-संसाधन और तकनीक पर ज़ोर

संसाधनों के मामले में हमें अपनी स्थिति और सोच दोनों को बदलना होगा.
हम साल भर में ऐसे आईसीयू को एक-दो बार संक्रमण मुक्त करके स्थितियों में सुधार नहीं ला सकते. ऐसा प्रतिदिन दो बार करना होगा.
नवजात बच्चों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने के लिए स्पेशल ट्रांसपोर्टेशन और स्पेशल वॉर्मर इस्तेमाल करने होंगे.
इसी तरह नवजात बच्चों के लिए इंट्राकैथ इस्तेमाल करने के बजाय आईवी फ्लूइड लाइन जैसे उपाय अपनाने चाहिए.

6-भ्रष्टाचार रोकिए

इन सारे उपायों के लिए ज़रूरी है कि अस्पतालों या मेडिकल कॉलेजों को अपने नियमित बजट रिलीज़ कराने के लिए लखनऊ के चक्कर न काटने पड़ें.
यह भ्रष्टाचार को जन्म देता है. सरकार को इस पर निगरानी रखनी होगी वरना बच्चों की मौत के मामले इसी तरह सामने आते रहेंगे.

Thursday, July 20, 2017

कॉफी पीने से लंबी हो सकती है आयु!

कॉफी पीने से लंबी हो सकती है आयु!

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एक शोध से पता चला है कि दिन भर में तीन बार कॉफी पीने से आपकी आयु लंबी हो सकती है.
यह शोध यूरोप के दस देशों के करीब पांच लाख लोगों पर किया गया. यह शोध 35 साल से ज़्यादा उम्र के लोगों पर किया गया.
एनाल्स ऑफ़ इंटरनल मेडिसिन नाम के जर्नल में छपे शोध में कहा गया है कि एक कप अतिरिक्त कॉफी पीने से किसी इंसान की आयु लंबी हो सकती है. भले ही यह कॉफी डिकैफ़िनेटेड (कैफ़िन निकाला गया) ही क्यों ना हो.
लेकिन कुछ विशेषज्ञों ने शोध के नतीजों पर शंका जाहिर की है. इन विशेषज्ञों का कहना है कि यह दावे के साथ नहीं कहा जा सकता है कि कॉफी की ही वजह से ही ऐसा हुआ है या फिर कॉफी पीने वाले लोगों के स्वस्थ जीवनशैली के कारण.
इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर एंड इम्पेरियल कॉलेज लंदन के शोधकर्ताओं का कहना है कि अधिक कॉफी पीने का ताल्लुक दिल और आंत की बीमारी से मरने का जोख़िम कम होने से है.
यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैम्ब्रिज के प्रोफेसर सर डेविड स्पीगलहालटर का कहना है कि अगर कॉफी की वजह से मृत्यु की दर में कमी का आकलन किया जाए तो एक अतिरिक्त कप कॉफी हर दिन पीने से मर्दों की उम्र तीन महीने ज़्यादा हो सकती है, जबकि औरतों की आयु औसतन एक महीने बढ़ जाती है.
हालांकि यह शोध बहुत बिलकुल सही तरीके से किया गया है लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि इसमें कोई चूक ना हुई हो. यह शोध ये भी नहीं बता सकता कि कॉफी के अंदर ऐसा क्या जादुई तत्व है, जिससे आयु बढ़ सकती है.

क्या है बच्चों में भी दांत पीसने की आदत : जानिये

 क्या है बच्चों में भी दांत पीसने की आदत : जानिये
अगर आपके बच्चों में भी दांत पीसने की आदत है तो बहुत संभव है कि स्कूल में उन पर धौंस (बुलिंग) जमाया जा रहा हो. यह बात एक नए शोध में सामने आई है.
मुंह के स्वास्थ्य से संबंधित एक चैरिटी ने कहा है कि माता-पिता और स्कूल को इस समस्या के बारे में पता होना चाहिए. यह तनाव और चिंता से गुजर रहें वयस्कों को भी प्रभावित कर सकता है.
दांत पीसने से सिर दर्द, दांत ख़राब होने और आधी-अधूरी नींद की समस्या भी हो सकती है.
विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में इजाफा भी देखा गया है.
यह शोध जर्नल ऑफ़ ओरल रिहैबिलिटेशन में प्रकाशित हुआ है. यह शोध ब्राज़ील में तीन सौ से अधिक किशोरों पर किया गया है.

नुकसान

इस शोध के नतीजों के मुताबिक़ स्कूल में बुलिंग के शिकार 13 से 15 साल के बच्चों में दांत पीसने की आदत चार गुना अधिक पाई गई है.
इनमें सोने के दौरान भी दांत पीसने की आदत देखी गई है. बुलिंग के शिकार 65 फ़ीसदी बच्चों में यह आदत देखी गई है जबकि जो बच्चे बुलिंग के शिकार नहीं थे उनमें सिर्फ़ 17 फ़ीसदी में यह आदत देखी गई.
ओरल हेल्थ फाउंडेशन के डॉक्टर नीगेल कार्टर ने कहा, "इस मामले में दांत पीसने से अधिक यह महत्व की बात है कि यह बच्चे की मानसिक स्थिति को दिखाता है और शुरुआती दौर में ही बुलिंग को पकड़ने में हमारी मदद करता है."
उन्होंने बताया कि सोने के दौरान दांत पीसना नुकसानदायक हो सकता है लेकिन अक्सर लोग इस बात को लेकर अनजान रहते हैं कि वो ऐसा कर रहे थे.
दांत पीसने से दांत की गंभीर बीमारियां हो सकती हैं. इससे दांतों में झनझनाहट, दांतों का घीसना, दांत टूटना और चेहरे और जबड़ों में दर्द जैसी शिकायत हो सकती है.
डॉक्टर नीगेल कार्टर बताते हैं कि दांत पीसना चबाने से 40 गुना अधिक ताकत वाली प्रक्रिया होती है.

Tuesday, July 4, 2017

साइकिल चलाने से कम होगा कैंसर का ख़तरा

साइकिल चलाने से कम होगा कैंसर का ख़तरा


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क्या आप लंबी ज़िंदगी जीना चाहते हैं? कैंसर के ख़तरे को कम करना चाहते हैं? तो साइकिल आपके लिए फ़ायदेमंद है. ये वैज्ञानिकों का कहना है.
अध्ययन के मुताबिक साइकिल के उपयोग से दिल की बीमारी और कैंसर की आशंका कम हो जाती है.
ब्रिटेन में नियमित आने-जाने वाले ढाई लाख लोगों पर किया गया अध्य्यन ये दिखाता है कि सार्वजनिक परिवहन में बैठने या कार में सफ़र करने के मुक़ाबले पैदल चलना ज़्यादा फ़ायदेमंद है.
ग्लासगो की टीम का कहना है कि एक बार नियमित कामकाज का हिस्सा बनने के बाद साइकिल चलाने के लिए किसी इच्छाशक्ति की ज़रूरत नहीं होती जैसे कि जिम जाने के लिए होती है.
पांच साल के अध्ययन में सक्रिय रहने वाले लोगों की तुलना उन लोगों से की गई जो अधिकतर स्थिर रहते हैं.
कुल मिलाकर जिन लोगों का अध्य्यन किया गया उनमें से 2430 लोगों की मौत हो गई, 3748 लोगों को कैंसर हुआ, 1110 लोगों को दिल से जुड़ी समस्याएं दिखाई दीं.
लेकिन अध्ययन के दौरान देखा गया कि लगातार साइकिल चलाने से किसी भी वजह से होने वाली मौत का ख़तरा 41 प्रतिशत तक कम हो जाता है. इनमें कैंसर के मामले 45 प्रतिशत और दिल की बीमारी के मामलों में 46 प्रतिशत हैं.
इनमें साइकिल चलाने वालों ने एक हफ़्ते में औसतन क़रीब 48 किलोमीटर साइकिल चलाई, लेकिन इसके आगे भी उन्होंने जितनी साइकिल चलाई वोउनकी सेहत के लिए वो वरदान साबित हुआ.
पैदल चलने से दिल की बीमारी विकसित होने में कमी आई, लेकिन फ़ायदा सिर्फ़ उन्हीं को हुआ जो हफ़्ते में क़रीब 10 किलोमीटर चलते थे.
ग्लासगो यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डॉ. जेसन गिल ने बीबीसी न्यूज़ वेबसाइट को बताया, ''ये सीधा सबूत है कि जो लोग क्रियाशील तरीकों से सफ़र करते हैं, ख़ासतौर से साइकिल से, उनको ख़तरा कम होता है. आपको रोज़ काम पर जाना है तो अगर आप साइकिल को उसका हिस्सा बना लें तो इच्छाशक्ति का सवाल ही नहीं उठता. हमें साइकिल के इस्तेमाल की आदत को आसान बनाने के लिए सिर्फ अपना बुनियादी ढांचा बदलना है, हमें एक अलग लेन की ज़रूरत है जिससे ट्रेन में साइकिल रख सकें.''
वो लोग जो साइकिल और सार्वजनिक परिवहन दोनों में सफ़र करते हैं उनकी सेहत में भी इसके फ़ायदे नज़र आए.

सांस फूलना

जिस तरह से ये अध्य्यन ब्रिटिश मेडिकल जर्नल में प्रकाशित किया गया, इसका मतलब था स्पष्ट कारण और असर का निर्धारण करना संभव नहीं है.
हालांकि धूम्रपान, खान-पान और मोटापे जैसे अन्य संभावित प्रभावों के आंकड़ों को हटाने के बाद भी इसका असर था.
जिस तरह से अध्ययन ब्रिटिश मेडिकल जर्नल में प्रकाशित किया गया था, इसका अर्थ था कि स्पष्ट कारण और प्रभाव का निर्धारण करना संभव नहीं है.
इसका मतलब है कि अध्ययन के मुताबिक़ साइकिल चलाने से कैंसर का ख़तरा कम हो जाता है, वज़न कम करने से नहीं हो सकता.
व्यायाम के तौर पर साइकिल चलाने को घूमने से बेहतर माना जाता है, हालांकि दोनों ही तेज़ होते हैं.
ब्रिटेन के कैंसर रिसर्च के क्लेयर हायड का कहना है, ''ये अध्य्यन आपकी दिनचर्या में क्रियाशीलता के संभावित लाभों को उजागर करने में मदद करता है. आपको जिम जाने या मैराथॉन दौड़ने की ज़रूरत नहीं है. कुछ भी जो आपके शरीर को थोड़ा गर्म करे और आपकी सांस फूलने लगे, चाहे वो साइकिलिंग हो या घर का कोई काम, आपकी मदद करता है.''

Monday, July 3, 2017

उम्रदराज़ पिताओं के बच्चे होते हैं जीनियस


उम्रदराज़ पिताओं के बच्चे होते हैं जीनियस


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ब्रिटेन के किंग्स कॉलेज लंदन में किए गए शोध के मुताबिक, ऐसे लोग पुरुष जो अधिक उम्र में पिता बनते हैं उनके बेटों के जीनियस होने की संभावना ज्यादा होती है.
इस अध्ययन के मुताबिक, ऐसे पिताओं के बेटे ज़्यादा तेज़ और तीक्ष्ण बुद्धि वाले होते हैं. हालांकि, अध्ययन के अनुसार, माताओं की उम्र का इस नतीजे पर कोई प्रभाव नहीं पढ़ता है. इसके साथ ही बेटियों के इससे बेअसर रहने की बात सामने आई है.
शोधार्थियों ने लगभग 15 हजार जुड़वा बच्चों को एक टेस्ट में शामिल किया. इस तरह टीम ने गीक इंडेक्स तैयार किया.
इसमें 12 वर्षीय जुड़वा बच्चों के नॉन-वर्बल आईक्यू, किसी विषय पर ध्यान केंद्रित करने की क्षमता और समाज से अलग रहने जैसे विषयों पर उनकी बुद्धि का आकलन किया.
ऐसे में जिन बच्चों का गीक स्कोर ज़्यादा था उन बच्चों ने स्कूल, विशेषत: विज्ञान, तकनीक, इंजीनियरिंग और गणित में बेहतर नतीजे दिए.
इसके संभावित कारणों में उम्रदराज पिताओं के देर से पिता बनने पर प्रतिभाशाली जीन से बच्चों के जन्म होने की संभावना है.
इसके अलावा उम्रदराज़ व्यक्तियों के बच्चों को सुविधाएं ज़्यादा मिलने या किसी जीन के म्यूटेट होने जैसी संभावनाएं भी हैं.
शेफ़ील्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर ऐलन पेसी के मुताबिक़, ऐसा हो सकता है कि गीक होना अच्छा लगे लेकिन दंपतियों को इस आधार पर परिवार को आगे बढ़ाने का फ़ैसला नहीं टालना चाहिए.
वो कहते हैं कि ज्यादा उम्र में बच्चा होने में दिक्कतें, गर्भपात और तमाम दोषों के साथ गर्भधारण का जोख़िम बढ़ जाता है.

Thursday, June 15, 2017

पीठ में है तकलीफ़ तो ये नुस्ख़े आज़माएं

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पीठ की तकलीफ़ की समस्या को दूर करने के लिए कुछ उपाय निम्नलिखित हैं-
1.अगर आप कामकाजी हैं तो डेस्क से नियमित समय अंतराल पर उठते रहें. हो सके तो इसके लिए अलार्म लगा लें. स्टैंडिंग डेस्क पर काम करें. अलग-अलग तरह की कुर्सियों का इस्तेमाल करें.
2.योग और मेडिटेशन करें, ये संभव नहीं हो तो वॉक ही किया करें.
3.अगर आप किसी एक्टिविटी को पसंद करते हैं तो उसे लंबे समय तक करें.
4.कोशिश करें कि एक्टिव रहें और इसके लिए नियमित तौर पर वॉक करें.

रोज़ाना ऐस्प्रिन लेने वाले

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हर्ट अटैक और स्ट्रोक के बाद रोज़ाना ऐस्प्रिन लेने वाले 75 साल से ज़्यादा उम्र के लोगों के लिए ये बहुत ख़तरनाक हो सकता है.
लैंसेट में प्रकाशित शोध के मुताबिक इससे पेट में काफ़ी रक्तस्राव हो सकता है. वैज्ञानिकों के मुताबिक रक्तस्राव से बचाव के लिए बुज़ुर्गों को पेट की सुरक्षा करने वाले पीपीआई पिल्स लेने चाहिए.
इन वैज्ञानिकों के मुताबिक ऐस्प्रिन लेने से हर्ट अटैक की आशंका कम होती है, ऐसे में ऐस्प्रिन का सेवन अचानक से बंद किया जाना भी ख़तरनाक हो सकता है.
वैज्ञानिकों के मुताबिक ऐस्प्रिन सेवन करने वाले लोगों को दवा में किसी बदलाव से पहले चिकित्सकों से सलाह लेनी चाहिए. आम तौर पर डॉक्टर किसी भी शख़्स को हर्ट अटैक आने के बाद उन्हें लाइफ़ टाइम रोज़ाना ऐस्प्रिन लेने की सलाह देते हैं.
लेकिन शोधकर्ताओं के मुताबिक ऐस्प्रिन से पेट में रक्तस्राव होने की आशंका बढ़ती है. हालांकि 75 साल से ज़्यादा उम्र के लोगों में अब तक के दूसरे शोधों के मुताबिक रक्तस्राव होने का ख़तरा कम होने का दावा किया जाता रहा है.
ये शोध ब्रिटेन के ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी का है. इस शोध अध्ययन में 3,166 मरीजों को शामिल किया गया. ये वो लोग हैं जिन्हें हर्ट अटैक आ चुका था और डॉक्टरों ने इन्हें ऐस्प्रिन लेने या रक्त को पतला करने वाले दूसरी दवाइयां लेने को कहा हुआ था.
इस शोध में देखा गया कि 65 साल से कम उम्र के प्रति 200 लोगों में एक आदमी के पेट में रक्तस्राव की आशंका थी, वहीं 75 से 84 साल के लोगों के लिए प्रति 200 लोगों में तीन आदमी में रक्तस्राव की आशंका देखी गई.
अध्ययन के मुख्य शोधकर्ता प्रोफ़ेसर पीटर रॉचवेल कहते हैं, "हमारे नए अध्ययन के मुताबिक 75 साल से ज़्यादा उम्र के लोगों में ऐस्प्रिन सेवन से ख़तरा ज़्यादा होता है."
हीं शेफ़ील्ड यूनिवर्सिटी के हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. टिम चिको बताते हैं कि ये महत्वपूर्ण अध्ययन है. हालांकि टिम के मुताबिक ऐस्प्रिन कईयों के लिए ख़तरनाक नहीं भी होता है.
ब्रिटेन में मौजूदा प्रावधानों के मुताबिक ज़्यादा ख़तरे की चपेट में आने वाले लोगों को ऐस्प्रिन के साथ साथ पीपीआई पिल्स दिया जा रहा है.

कलाम के सम्मान में नासा ने बैक्टीरिया का नाम रखा 'कलामी'

लॉस एंजेलिस 
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भारत के लिए एक अच्छी खबर है। नासा के वैज्ञानिकों ने उनके द्वारा खोजे गए एक नए जीव को भारत के पूर्व राष्ट्रपति और अंतरिक्ष वैज्ञानिक एपीजे अब्दुल कलाम का नाम दिया है। अभी तक यह नया जीव (जीवाणु की एक किस्म) सिर्फ अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) में ही मिलता था। यह पृथ्वी पर नहीं पाया जाता था। 

नासा की प्रयोगशाला ने अंतरग्रही यात्रा पर काम करते हुए अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन के फिल्टरों में इस नए जीवाणु को खोजा और भारत के पूर्व राष्ट्रपति कलाम के सम्मान में इसे सोलीबैकिलस कलामी नाम दिया। 1963 में कलाम ने शुरुआती ट्रेनिंग नासा में ली थी। इसके बाद उन्होंने केरल के थुंबा में मछुआरों के गांव में भारत का पहला रॉकेट प्रक्षेपण केंद्र स्थापित किया था।

मुंह को काटे बिना रोबोट की सहायता से ट्यूमर निकालना मुमकिन

मुंह को काटे बिना रोबोट की सहायता से ट्यूमर निकालना मुमकिन
मुंह को काटे बिना रोबोट की सहायता से ट्यूमर निकालना मुमकिन (प्रतीकात्मक फोटो)
नयी दिल्ली: अगर कोई व्यक्ति मुंह, गले या गर्दन के कैंसर से जूझ रहा है और कीमोथेरेपी और रेडिएशन से उपचार कराना नहीं चाहता तो उनके लिए भारत में भी रोबोटिक सर्जरी की सहायता से ट्यूमर निकालने की नई तकनीक मौजूद है और डॉक्टरों के मुताबिक यह अपेक्षाकृत कम दर्द वाली है.
इस तकनीक से मुंह गले या गर्दन के कैंसर से पीड़ित किसी व्यक्ति के मुंह को काटा नहीं जाता बल्कि रोबोट की सहायता से ट्यूमर को निकाला जाता है.
दरअसल, इस तकनीक में एक रोबोट और उसकी कई बाहें होती है जिसमें से एक पर कैमरा लगा होता है. इसके जरिए मुंह, गले और गर्दन के उस हिस्से तक पहुंचा जा सकता है जहां ट्यूमर है और वहां तक डॉक्टर के हाथ नहीं पहुंच पाते. रोबोट की सहायता से ट्यूमर को काटकर निकाल लिया जाता है तथा मरीज के मुंह एवं गर्दन में चीरा नहीं लगाया जाता है.
इस तकनीक के माध्यम से फोर्टिस मेमोरियल रिसर्च इंस्टीट्यूट में 500 ऑपरेशन किए गए हैं और अस्पताल ने 57 लोगों पर एक अध्ययन भी किया है जो ढाई साल की अवधि में किया गया है. डॉक्टर का कहना है कि 57 में से 43 मरीज कैंसर से मुक्त हो गए.
अस्पताल में ‘नेक एंड थ्रॉक्स सर्जिकल ऑन्कोलॉजी’के निदेशक डॉ सुरेंद्र डबास ने कहा कि यह तकनीक अपेक्षाकृत आसान है. जहां कीमोथेरेपी और रेडिएशन में सात हफ्ते का वक्त लगता है वहीं इसमें रोगी को ठीक होने में सात दिन लगते हैं.
उन्होंने कहा, ‘इसमें रोबोट की बाहों के माध्यम से मुंह के अंदर उन हिस्सों में पहुंचा जाता है जहां डॉक्टर के हाथ नहीं पहुंच पाते. इसकी एक बाह में कैमरा लगा होता है और डॉक्टर उसमें देखकर थ्री डी के माध्यम से रोबोट की सहायता से ट्यूमर को काटकर निकाल देता है.’उन्होंने कहा कि इस तकनीक से ऑपरेशन करने में 20 मिनट का वक्त लगता है.
डॉ डबास ने कहा कि इसमें रोगी को चार-पांच दिन में अस्पताल से छुट्टी मिल जाती है. इसमें कम दर्द होता है. कम खून बहता है. संक्रमण का भी खतरा कम होता है और रोगी जल्दी अपनी सामान्य गतिविधियां शुरू कर सकता है. उन्होंने कहा कि इस तकनीक के माध्यम से पीड़ित की आवाज भी बेहतर रहती है और खाने में भी उसे तकलीफ नहीं होती.
उन्होंने कहा कि इस अध्ययन में शुरूआती कैंसर से पीड़ित 57 मरीजों को शामिल किया गया है जिनका मार्च 2013 से अक्तूबर 2015 के बीच मुंह, गले और गर्दन में से ट्यूमर निकाला गया था. इसमें से 43 फीसदी मरीज रोगमुक्त हो गए.
उन्होंने कहा कि अगर कैंसर को वापस आना होता है तो वो दो साल में आ जाता है लेकिन उनका अध्ययन ढाई साल का है उन्होंने कहा कि 57 मरीजों में 48 पुरूष थे और नौ महिलाएं थीं. उनकी औसत आयु 59.4 वर्ष थी.

भारतीय ने खोजा खारे पानी को पीने योग्य बनाने का तरीका

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सैन फ्रांसिस्को। अमेरिका में भारतीय मूल के छात्र ने खारे पानी को पीने योग्य जल में तब्दील  करने का एक सस्ता और आसान तरीका खोज निकाला है। इस छात्र के शोध ने कई बड़ी  तकनीकी कंपनियों और विश्वविद्यालयों का ध्यान अपनी तरफ खींचा है।  

कारम्चेडू ने कहा कि प्रत्येक 8 में से 1 व्यक्ति के पास पीने के लिए स्वच्छ जल की व्यवस्था  नहीं है। यह एक ऐसी चीज है जिसमें जल्द सुधार की जरूरत है। उन्होंने इस समस्या का  समाधान करने का मन बना लिया है। उच्च बहुलक के साथ खारे पानी पर प्रयोग करके इस  किशोर ने समुद्री जल से नमक हटाकर पीने योग्य जल तैयार करने का सस्ता तरीका खोज  निकाला है। 

ऐसी 'मशीन' जो सूंघकर बता देती है बीमारी का पता

कैलिफोर्निया। पुराने जमाने में नाड़ी शास्त्र के ज्ञाता आदमी की नब्ज पकड़कर यह पता लगा लेते थे कि व्यक्ति किस बीमारी से पीडि़त है, लेकिन वैज्ञानिक अब ऐसी मशीन बनाने का प्रयास कर रहे हैं जो कि बीमार को सूंघकर  ही बता देगी कि उसके कौन सा रोग है। विदित हो कि जल्द ही ऐसी मशीन का निर्माण होने वाला है। इस मशीन के आविष्कार में जुटे वैज्ञानिकों का कहना है कि यह मशीन आसानी से सांस, ब्लड और यूरीन जनित रोगों को पहचान  लेगी।   

हम सभी की एक अद्वितीय गंध होती है जो हजारों कार्बनिक यौगिकों से मिलकर बनती है। इस महक से हमारी उम्र, जैनेटिक, लाइफस्टाइल, होमटाउन और यहां तक कि हमारे मेटाबॉलिक प्रोसेस के बारे में भी पता चलता है। विदित हो कि प्राचीन यूनानी और चीनी चिकित्सक रोग को पहचानने के लिए मरीज की गंध का इस्तेमाल किया करते थे। 

अब इसी पुरानी तकनीक को इस्तेमाल करते हुए वैज्ञानिक फिर से प्रयोग में लाने तैयारी में हैं। इस तकनीकी के तहत त्वचा और सांस की गंध से बीमारी का पता लगाया जा सकेगा। उदाहरण के तौर पर वैज्ञानिकों का कहना है कि मधुमेह रोगियों की सांस सड़े हुए सेब जैसी आती है। टाइफाइड रोगियों की त्वचा बेकिंग ब्रैड जैसी गंध देती हैं।  

वैसे तो हर डॉक्टर भी कुछ बीमारियों को किसी हद तक सूंघ सकता है, लेकिन यह इस पर निर्भर करता है कि उसकी नाक कितनी संवेदनशील है और वह सूंघ कर बीमारियां पहचानने का कितना अनुभवी है। इस वजह से खोजकर्ता कम एक ऐसे सेंसर पर काम कर रहे हैं जो रोग को पहचान ले। 

Wednesday, June 14, 2017

अगर हैं शादीशुदा तो दिल देता रहेगा साथ

शादी आपकी सेहत के लिए अच्छी होती है. शोधकर्ताओं का कहना है कि अगर आपको हाई कॉलेस्ट्रॉल जैसे कारणों से दिल का दौरा पड़ने के ख़तरे हैं तो शादी की वजह से आपके जीवित रहने की संभावना बढ़ जाती है.
ब्रिटेन में क़रीब दस लाख वयस्कों पर किए गए एक शोध के आधार पर शोधकर्ताओं ने एक कॉन्फ्रेंस में बताया कि एक प्यार करने वाला पार्टनर आपको अपनी देखभाल बेहतर तरीके से करने को प्रेरित कर सकता है.
शोध में शामिल सभी लोगों को हाई ब्लड प्रेशर, कॉलेस्ट्रॉल या डायबिटीज़ की समस्या थी. लेकिन उनमें सिंगल लोगों के मुकाबले शादीशुदा लोगों का स्वास्थ्य बेहतर था.

अच्छी है शादी

शोध करनेवाले एस्टन मेडिकल स्कूल के डॉक्टर पॉल कार्टर और उनके सहकर्मियों ने बताया है कि शादी से दिल का दौरा पड़ने पर जान बचने की उम्मीद बढ़ जाती है.
ब्रिटिश कार्डियोवैस्क्यूलर सोसायटी के इस हालिया शोध में इसकी वजह भी बताई गई है.
शोधकर्ताओं का अनुमान है कि दिल की बीमारी के लिए ज़िम्मेदार हाई कॉलेट्रॉल और हाई ब्लड प्रेशर जैसे जोख़िम की स्थिति में अगर मरीज़ शादीशुदा है तो उसका रिस्क कम हो जाता है

अध्ययन में दिल की बीमारी से मौत के साथ-साथ हर तरह की बीमारी से होनेवाली मृत्यु को शामिल किया गया था.
शोध के नतीजों में बताया गया है कि हाई कॉलेट्रॉल वाले 50, 60 और 70 की उम्र की महिलाओं और पुरुषों में शादीशुदा लोगों के बचने की संभावना 16 फ़ीसदी तक ज़्यादा होती है.
ऐसी ही हालत मधुमेह और उच्च रक्तचाप के मरीज़ों के मामले में भी पाया गया है.
हालांकि सेक्सुअली एक्टिव, एक-दूसरे से अलग रह रहे पति-पत्नी, तलाकशुदा लोगों के मामले में ये तस्वीर उतनी साफ़ नहीं है.
इसके अलावा शोधकर्ताओं ने इस बात की भी जांच नहीं की है कि शादीशुदा लोग वाक़ई खुशहाल हैं या नहीं.
उनका कहना है कि सिर्फ़ शादीशुदा होने की बजाए आपकी ज़िंदगी में किसी ख़ास शख़्स की मौजूदगी से भी फ़र्क पड़ता है.
शोध करनेवाले डॉक्टर कार्टन कहते हैं,"हमें दिल की बीमारी के कारणों पर थोड़ा और अध्ययन करना होगा. लेकिन शोध में ये बात सामने आई है कि शादीशुदा ज़िंदगी न केवल दिल की बीमारी की हालत में बल्कि जिन लोगों में इसके जोख़िम ज़्यादा हैं उनमें भी मददगार साबित होती है. लेकिन हम ये नहीं कह रहे कि हर इंसान को शादी कर ही लेनी चाहिए. हमें शादी के सकारात्मक प्रभाव को समझने की ज़रूरत है."

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